मन के तराजू में
तुलता है
मोह सम्मान
जीवन बाट पैबंद लगा हृदय
तन आवरण है
झूठा ठाट
कर्मों का गोदाम
भर जाता है, डर जाता है
परिग्रहण परिणाम
मौत की प्रतीक्षा में
टूटता तराजू
छूटता गोदाम
यूँ ही हो जाता है
सम्पूर्ण ये उम्र तमाम
कैसे मुक्ति ही, कैसे युक्ति हो
किन परिणामों से भरा हो
कर्मों का गोदाम
समझ न पाया कोई बनिया
कंजूस रह गया भगवान
न दी बुद्धि उसने
न सरलता का दान
अंगुली उठाने पर
न करना प्रश्न तुम
अपनी भूलों को टालने का
मार्ग न मिला, सुबह से हुई शाम ।

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