Thursday, May 26, 2016

ज्ञान जगाएँ


ज्ञान जगाएँ  अक्षर 
किताबें बनाए साक्षर 
क्युं निरर्थक देखें  इधर-उधर 
साथी  आ चिंतन में जा उतर-उतर । 

 चैन ये लाती है किताबें 
लगन जगती है किताबें 
चित अस्थिर  ना  हो तो
शांति दिलाती हैं किताबें 
ना हो जा तू देखने पर निर्भर-निर्भर। 

ज्ञान किताबों  का मन में सजता 
चरित्र शब्दों  से ही सवंरता 
भाषा में जिसके होता बल 
जीवन  में आगे वो ही बढ़ता 
देर न कर नहा 
शब्द  हैं  निर्झर-निर्झर। 

किताबें खेल सिखाती  हैं 
किताबें ज्ञान बढाती  हैं 
किताबें सच्ची साथी हैं 
अच्छा  मार्ग  दिखाती हैं 
ज्ञान धूप  में तपकर
प्यारे होजा प्रखर-प्रखर। 

बेरंग



रंगो का   मेल 
जीवन  में क्या 
बस एक रंग जी लें 
दूसरा रंग  आते ही 
मन होता परेशान 
क्या अजब है इंसान 

सब रंगो को पाकर 
बेरंग  होता जीवन 
जीना होता अनमन 
आदत सी हो जाती 
रंग भाते नहीं 
छोड़ने के भाव आते नहीं 
जीवन का गान, जाता है रूठ 
सुख-चैन  स्वयं का जाता है छूट 

भ्रम  एक सवार होता 
रंगो में न जीना ही 
जीने के  सामान होता 
रंग जीवन में व्याप्त होकर 
न होते जीवन का सार 
खोज न पाते रंग के पार 
साथ  रहता, रंग युक्त  बेरंग जीवन 
अस्थिर  तन-मन । 


 

प्रेम का राही


 थक गया, प्रेम का राही 
पूर्व प्रेमियों का हश्र देख कर । 
चुक  गया, प्रेम का खजाना 
रीते ह्रदय  का अक्स देख कर । 

अब  तो केवल निर्वाह  है 
संसार की कुछ परवाह है 
बिना प्रेम का जीवन गवाह है 
रुक गया, वासना के पथ 
लघु जीवनों का अंत देखा कर ।
 
कोई आ रुक जाता दरवाजे पर 
कोई आ झुक जाता मेरे इशारे पर 
कोई लुटा देता प्रेम  ना  चाहने पर 
सोच लिया, प्रेम क लिए 
जाते पलों का  देख कर ।
 
अब आंसूओं  की बरसात नहीं 
किसी प्रतिमा का साथ नहीं 
किसी गली की बात नहीं 
छोड़ दिया, प्रेम  के आधारों को 
नींव  विहीन ह्रदय सख्त  देख कर ।
 
प्रेम से बड़ा दिन का  बीतना 
आंनद -बाग  को शांति जल से सींचना 
मोह की और ढलते मन को खींचना 
तोड़ दिया, कोमल प्रेम के पत्तों को 
डाली पर फूलों का अक्स देख कर । 




Monday, May 23, 2016

स्वागत गीत

  


आओ  स्वागत अतिथि  तुम्हारा 
उपवन-उपवन हर्षाया, और ये फैला उजियारा। 

प्राण -नीड़  में हे अभ्यागत,  तुम ही श्वास  बने 
नित  पुरातन शैली  में, नूतन आस  बने 
उत्सव पंछी मन  आकाश विहारा । 

दिग दिगन्त  में हे  मानव, स्वागत धुन  बजे 
निज सहज की बेली  में,  प्रेम के फूल सजे 
जीवन  वंशी  स्वर माधुर्य  उभारा । 

धन्य -धन्य  कियुा तुमने, धन्यवाद  हे  आगत 
राग- द्वेष के झरने में, राग बूंद  का स्वागत 
सिहर चमक ये जन-मन आस  निहारा । 





पीड़ा



इन दीवारों  में जीवन  गुजारते  रहे 
फर्श के साथ ख़ुशी बुहारते रहे । 

कैद कर दिया समाज की नजरों  ने 
नियम के साथ मर्द के पहरों  ने 
सिसकते हुए समय को निहारते रहे । 

मेरी ख़ुशी को न पूछा  किसी हमदर्द ने 
अपनी इज्जत को देखा मेरी पसंद  में 
बारहा देखा हुआ झूठ संवारते  रहे । 

जाना नहीं मैंने आजादी का सच कभी 
आजाद पंछी देखा तो झूठ लगा तभी 
पर कटे  तो  तड़प  की मारते रहे । 




Saturday, May 21, 2016

सपनों में जीना

सपनों की महक
बचपन से मुझे अपने भावों  में निरन्तर परिवर्तन महसूस होता है और  शब्द यदि भाव को पकड़ते  हैं तो महसूस करना आच लावत है। सरल भावों को गूढ़ शब्दावली में पिरोना और जटिल भावों को सरल शब्दों में स्थान देने में आनंद आता है। समाज और श्रोता उसे कविता कहें या मन का अथवा कोई भी नाम दें, इस सबसे कोई अन्तर नहीं पड़ता।

          एक बात मुझे शिद्दत से महसूस होती है कि भाव या संवेग अस्थिर है और काल के साथ वह मनुष्य को बदलते रहते हैं। मनुष्य जब भी अपने अतीत की ओर दृष्टि डालता है उसे वर्तमान असहज या सहज महसूस होता है। दोनों ही स्थितियों में हृदय की व्याकुलता मुखर होती है और अगर उसे हम शब्दों मैं पिरो सकें तो वह हमारा दर्शन हो जाता है, इसलिए मैं मान लेता हूँ कि दर्शन के नियम अस्थिर है। जीवन व्यवहार में उनका पालन करना बहुत कठिन होता है।

        हर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति के स्थिरीकरण पर संदेह ने मुझे अभिव्यक्ति प्रदान की है और इसी अस्थिरीकरण को जीते हुए मैंने अपने भाव-विचारों को कविता या गीत के रूप मैं अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

       मेरे भाव-विचारों का कविता रूपी यह प्रथम संकलन है पर शायद अंतिम नहीं। मेरे ये गीत, कविता यदि आपने हृदय को स्पर्श कर आपको उद्वेलित कर पाते हैं तो मेरा यह प्रयास सार्थक होगा। मेरी लेखनी निरन्तर मेरी कल्पनाओं को नए भाव प्रदान करती रहती है। मुझे आशा है मेरी कविताओं का रसास्वादन कर आप मुझे नई प्रेरणायें और उत्साह प्रदान करेंगे। अस्तु!



- सुशील बोथरा



Friday, May 20, 2016

राख में चिंगारी


राख में चिंगारी छूट गई है
आस से ये जड़ता टूट गई है।

जला देती चिंगारी ख़्वाबों के महल
आज जलता है, साथ जलता है कल
यूँ ही चलने की भावना रूठ गई है।

जला देती चिंगारी एकरसता के मन को
मिला देती राख मन की उलझन को
सच के खजाने की चाभी लूट गई है।

जला देती चिंगारी निशा के कबाड़ को
यूँ ही उग...आए झार-झंखाड़ को
मंजिल में मार्ग की बाधा मिट गई है।


Wednesday, May 18, 2016

खटराग

खटराग सा लगता है
सोकर उठना
वही चाय, दूध, नाश्ता
नित कार्यालय को जाना
वही काम
देर रात घर लौटना
कुछ बातें, टी०वी०-सी०वी०
और सो जाना।

कुछ उलट-पुलट हो जाता
रविवार को
राग तोड़कर कुछ कर गुजरता
प्रतीक्षा हो जाती सोमवार की
दिनचर्या के आगे लगता
मैं लाचार
संभवत: मुझे हो गया
खटराग से प्यार।

बड़ी मुश्किल से करता
बदलाव को स्वीकार
अच्छा लगता
जब कोई स्वांग
बन जाए खटराग।

Monday, May 16, 2016

निर्गुणा

ओढे सोहे पर नाहीं खबरिया
मैली हो गई अपनी चदरिया।

जब-जब धोये फिर मैल आए
चदरिया को किससे छुपाएँ
कौन जुगत करे रहे धौली चदरिया।

दिन-दिन बीते और कट जाए
उमरिया के साथ चदरिया फट जाए
धूप धूल सहे, सहे पानी बदरिया।

ज्ञान साबुन अभ्यास जल से
शान्त जीवन ओ दूर छल से
चाहिए त्याग धूप से सूखी चदरिया।

Friday, May 13, 2016

मंगल गान




मंगल सुनाने को हम हैं आए
कह रहे बात जो मन में छुपाए।

जीवन सागर तन नय्या, खेते हम जाते हैं
कभी उस पार या इस पार हम आते हैं
आशा ने क्या-क्या भ्रम हैं बनाए।

आए तो पराये थे, गए वो अपनो से
कल तक साथ थे, आज हैं सपनों से
मृत्यु ने सब रूप हैं दिखाए।

डिग्री है बड़ी सी, पर काम न मिलता हैं
हमें अपनी प्रतिभा का दाम न मिलता हैं
बेकारी से सब हैं उकताए।

आस्था मंगल, ज्ञान मंगल, कर्म ही मंगल है
सब धर्मों में, मानव धर्म ही मंगल है
सबका हो मंगल भावना ये भाएँ।

Wednesday, May 11, 2016

जीवन देखो


नीरों को कैसे पी जाता जीवन देखो
होठों को कैसे सी पाता जीवन देखो!

सूखे नीरों के पीछे है तड़पता मन
मूक वाणी के पीछे है बोलता मन
मन को ही कैसे भूल जाता जीवन देखो!

कोटि स्वर एक सा मन से उभरे
सिद्धान्त नया जीवन सबका निखरे
सहने के विरुद्ध सजता जीवन देखो!

अग्नि से त्वरित जलता मन
राख होकर भी छलता मन
मन हो ना तो कैसा जीवन देखो!

प्रेम घृणा सर्व मन विस्तार हैं
हर कर्म में कुण्ठित विचार हैं
अहम् रूम यूँ धरता जीवन देखो!

थोड़े रस को पा मन घरेलता जीवन
रोते-धोते धूमिल चित्र उकेरता जीवन
ज्ञान बिना भी जिया जाता जीवन देखो!

Monday, May 9, 2016

स्वकथ्य

अश्कों की स्याही से,गम के कागज पर ये गीत लिखे मैंने!

क्या हुआ जो ये जहाँ हँस पड़ा
खूने जिगर के कतरों से है गम बड़ा
कैसे कह दूँ किस चाहत पर
ये गीत लिखे मैंने!

सामने हँसकर गमे दिल ओझल किया
फिर भी शब्दों ने है बोझल किया
कैसे कह दूँ किस आफत पर
ये गीत लिखे मैंने!

तोड़ा अपनों ने तो छोड़ा है सपनों ने
अकेले हो गए हम, सारे हम वेतनों में
कैसे कह दूँ किस जरुरत पर
ये गीत लिखे मैंने!

छुप के छू गई कोई आस टूटी सी
सांसें है पर ज़िन्दगी कहीं छूटी सी
कैसे कह दूँ किस शराफत पर
ये गीत लिखे मैंने!

घड़ी आए जाने की गीतों से विदा करना
याद आए कभी तो सुनने की दुआ करना
कैसे कह दूँ किस हकीकत पर
ये गीत लिखे मैंने!

Saturday, May 7, 2016

सरस्वती वंदना


कुञ्ज ज्ञान से  भरा ढाल रस  चख  लिए
वीणापाणि के पग , सर अपना रख  लिए ।

पलों में खोता  जीवन थाम लिया  है
पलों  में आनंद स्वर तान  लिया है
सोते भारती युगों  से,  आज वो जग लिए।

धर्म  के भ्रष्ट  सभी  राही  थे हम
सादी  मंजिल की काली  स्याही थे  हम
गाते स्वर एक से ,  एक दृष्टि  तक  लिए ।

अहं  छाँव से चले धूप  मोह  की खिली
भूख और  गरीबी  हमें  विरासत  मिली
वरदान अब मिला , सच्चा  मार्ग लख  लिए ।

आलम्बन  का सुख तज  स्वावलंबी  हों
बंध  अज्ञान  काट विधा आलम्बी  हो
कर्म धन इतना  हो , फिरें अपने पग  लिये ।