रंगो का मेल
जीवन में क्या
बस एक रंग जी लें
दूसरा रंग आते ही
मन होता परेशान
क्या अजब है इंसान
सब रंगो को पाकर
बेरंग होता जीवन
जीना होता अनमन
आदत सी हो जाती
रंग भाते नहीं
छोड़ने के भाव आते नहीं
जीवन का गान, जाता है रूठ
सुख-चैन स्वयं का जाता है छूट
भ्रम एक सवार होता
रंगो में न जीना ही
जीने के सामान होता
रंग जीवन में व्याप्त होकर
न होते जीवन का सार
खोज न पाते रंग के पार
साथ रहता, रंग युक्त बेरंग जीवन
अस्थिर तन-मन ।

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