Wednesday, May 18, 2016

खटराग

खटराग सा लगता है
सोकर उठना
वही चाय, दूध, नाश्ता
नित कार्यालय को जाना
वही काम
देर रात घर लौटना
कुछ बातें, टी०वी०-सी०वी०
और सो जाना।

कुछ उलट-पुलट हो जाता
रविवार को
राग तोड़कर कुछ कर गुजरता
प्रतीक्षा हो जाती सोमवार की
दिनचर्या के आगे लगता
मैं लाचार
संभवत: मुझे हो गया
खटराग से प्यार।

बड़ी मुश्किल से करता
बदलाव को स्वीकार
अच्छा लगता
जब कोई स्वांग
बन जाए खटराग।

No comments:

Post a Comment