Friday, May 20, 2016

राख में चिंगारी


राख में चिंगारी छूट गई है
आस से ये जड़ता टूट गई है।

जला देती चिंगारी ख़्वाबों के महल
आज जलता है, साथ जलता है कल
यूँ ही चलने की भावना रूठ गई है।

जला देती चिंगारी एकरसता के मन को
मिला देती राख मन की उलझन को
सच के खजाने की चाभी लूट गई है।

जला देती चिंगारी निशा के कबाड़ को
यूँ ही उग...आए झार-झंखाड़ को
मंजिल में मार्ग की बाधा मिट गई है।


3 comments:

  1. ख्वाबों के महलों का जलना.....। भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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  2. ख्वाबों के महलों का जलना.....। भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

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