Monday, May 9, 2016

स्वकथ्य

अश्कों की स्याही से,गम के कागज पर ये गीत लिखे मैंने!

क्या हुआ जो ये जहाँ हँस पड़ा
खूने जिगर के कतरों से है गम बड़ा
कैसे कह दूँ किस चाहत पर
ये गीत लिखे मैंने!

सामने हँसकर गमे दिल ओझल किया
फिर भी शब्दों ने है बोझल किया
कैसे कह दूँ किस आफत पर
ये गीत लिखे मैंने!

तोड़ा अपनों ने तो छोड़ा है सपनों ने
अकेले हो गए हम, सारे हम वेतनों में
कैसे कह दूँ किस जरुरत पर
ये गीत लिखे मैंने!

छुप के छू गई कोई आस टूटी सी
सांसें है पर ज़िन्दगी कहीं छूटी सी
कैसे कह दूँ किस शराफत पर
ये गीत लिखे मैंने!

घड़ी आए जाने की गीतों से विदा करना
याद आए कभी तो सुनने की दुआ करना
कैसे कह दूँ किस हकीकत पर
ये गीत लिखे मैंने!

1 comment:

  1. कैसे कह दूँ किस हकीकत पर
    ये गीत लिखे मैंने... वाह! बहुत वेहतरीन भाव।

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