इन दीवारों में जीवन गुजारते रहे
फर्श के साथ ख़ुशी बुहारते रहे ।
कैद कर दिया समाज की नजरों ने
नियम के साथ मर्द के पहरों ने
सिसकते हुए समय को निहारते रहे ।
मेरी ख़ुशी को न पूछा किसी हमदर्द ने
अपनी इज्जत को देखा मेरी पसंद में
बारहा देखा हुआ झूठ संवारते रहे ।
जाना नहीं मैंने आजादी का सच कभी
आजाद पंछी देखा तो झूठ लगा तभी
पर कटे तो तड़प की मारते रहे ।

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