Saturday, May 21, 2016

सपनों में जीना

सपनों की महक
बचपन से मुझे अपने भावों  में निरन्तर परिवर्तन महसूस होता है और  शब्द यदि भाव को पकड़ते  हैं तो महसूस करना आच लावत है। सरल भावों को गूढ़ शब्दावली में पिरोना और जटिल भावों को सरल शब्दों में स्थान देने में आनंद आता है। समाज और श्रोता उसे कविता कहें या मन का अथवा कोई भी नाम दें, इस सबसे कोई अन्तर नहीं पड़ता।

          एक बात मुझे शिद्दत से महसूस होती है कि भाव या संवेग अस्थिर है और काल के साथ वह मनुष्य को बदलते रहते हैं। मनुष्य जब भी अपने अतीत की ओर दृष्टि डालता है उसे वर्तमान असहज या सहज महसूस होता है। दोनों ही स्थितियों में हृदय की व्याकुलता मुखर होती है और अगर उसे हम शब्दों मैं पिरो सकें तो वह हमारा दर्शन हो जाता है, इसलिए मैं मान लेता हूँ कि दर्शन के नियम अस्थिर है। जीवन व्यवहार में उनका पालन करना बहुत कठिन होता है।

        हर अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति के स्थिरीकरण पर संदेह ने मुझे अभिव्यक्ति प्रदान की है और इसी अस्थिरीकरण को जीते हुए मैंने अपने भाव-विचारों को कविता या गीत के रूप मैं अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।

       मेरे भाव-विचारों का कविता रूपी यह प्रथम संकलन है पर शायद अंतिम नहीं। मेरे ये गीत, कविता यदि आपने हृदय को स्पर्श कर आपको उद्वेलित कर पाते हैं तो मेरा यह प्रयास सार्थक होगा। मेरी लेखनी निरन्तर मेरी कल्पनाओं को नए भाव प्रदान करती रहती है। मुझे आशा है मेरी कविताओं का रसास्वादन कर आप मुझे नई प्रेरणायें और उत्साह प्रदान करेंगे। अस्तु!



- सुशील बोथरा



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