Saturday, May 7, 2016

सरस्वती वंदना


कुञ्ज ज्ञान से  भरा ढाल रस  चख  लिए
वीणापाणि के पग , सर अपना रख  लिए ।

पलों में खोता  जीवन थाम लिया  है
पलों  में आनंद स्वर तान  लिया है
सोते भारती युगों  से,  आज वो जग लिए।

धर्म  के भ्रष्ट  सभी  राही  थे हम
सादी  मंजिल की काली  स्याही थे  हम
गाते स्वर एक से ,  एक दृष्टि  तक  लिए ।

अहं  छाँव से चले धूप  मोह  की खिली
भूख और  गरीबी  हमें  विरासत  मिली
वरदान अब मिला , सच्चा  मार्ग लख  लिए ।

आलम्बन  का सुख तज  स्वावलंबी  हों
बंध  अज्ञान  काट विधा आलम्बी  हो
कर्म धन इतना  हो , फिरें अपने पग  लिये ।

1 comment:

  1. बहुत सुन्दर सरस्वती वंदना!

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