Wednesday, May 11, 2016

जीवन देखो


नीरों को कैसे पी जाता जीवन देखो
होठों को कैसे सी पाता जीवन देखो!

सूखे नीरों के पीछे है तड़पता मन
मूक वाणी के पीछे है बोलता मन
मन को ही कैसे भूल जाता जीवन देखो!

कोटि स्वर एक सा मन से उभरे
सिद्धान्त नया जीवन सबका निखरे
सहने के विरुद्ध सजता जीवन देखो!

अग्नि से त्वरित जलता मन
राख होकर भी छलता मन
मन हो ना तो कैसा जीवन देखो!

प्रेम घृणा सर्व मन विस्तार हैं
हर कर्म में कुण्ठित विचार हैं
अहम् रूम यूँ धरता जीवन देखो!

थोड़े रस को पा मन घरेलता जीवन
रोते-धोते धूमिल चित्र उकेरता जीवन
ज्ञान बिना भी जिया जाता जीवन देखो!

1 comment:

  1. जीवन जीने के जाने कितने ही रूप हमारे सामने आते हैं ...
    बहुत सुन्दर रचना
    बहुत अच्छा लगा आपका ब्लॉग
    निरन्तर लिखते रहिएगा
    सादर

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