आओ स्वागत अतिथि तुम्हारा
उपवन-उपवन हर्षाया, और ये फैला उजियारा।
प्राण -नीड़ में हे अभ्यागत, तुम ही श्वास बने
नित पुरातन शैली में, नूतन आस बने
उत्सव पंछी मन आकाश विहारा ।
दिग दिगन्त में हे मानव, स्वागत धुन बजे
निज सहज की बेली में, प्रेम के फूल सजे
जीवन वंशी स्वर माधुर्य उभारा ।
धन्य -धन्य कियुा तुमने, धन्यवाद हे आगत
राग- द्वेष के झरने में, राग बूंद का स्वागत
सिहर चमक ये जन-मन आस निहारा ।

बहुत सुन्दर है स्वागत गीत!
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